Posts

Showing posts from September, 2021

|||| वर्णमाला |||

एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँ अ  से अनार अ से अमरूद लेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचार कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से क्रूरता क से कुटिलता अभी तक ख से खरगोश लिखता आया हूँ लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है मैं सोचता था फ से फूल ही लिखा जाता होगा बहुत सारे फूल घरो के बाहर घरों के भीतर मनुष्यों के भीतर लेकिन मैंने देखा तमाम फूल जा रहे थे ज़ालिमों के गले में माला बन कर डाले जाने के लिए कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है द दमन का और प पतन का सँकेत है आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं समाज की हिंसा ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें वे ह से हत्या लिखते रहते हैं हर समय |                             ——   श्रीमंगलेश डबराल

||| देख लू एक बार दुनिया को |||

उड़ लू हवा के झोको में चुंग लू दाना पानी इन्हीं खेतों में पी लू नदियों की पानी इन्ही हवा के झोको में                              देख लू एक बार... दुनिया को                              फिर चाहे रखना किसी कमरे मे                              छोड़ी संसार, छोड़ी उम्मीदें                              बस सिर्फ रखना हमे पिंजड़े में पंख काटे तूने... दाना भी देना तू न उड़ पाऊंगा हवा के झोको में चुंग न पाऊंगा खेतों में पंख काटे तूने... रखना पिंजड़े में                        न नदिया, पानी, और न खेतों की                         हरियाली,             ...

||| डायन |||

 थस सा जा रहा, उभरे हड्डियां अब सब कुछ बयां करती हैं, हाथ फैला लेने को मजबूर करती है, तन पर लपेटे पतली सी गंदी लिबास , नंगे पांव पैर के ऊपर कई घाव के दाग , करती हैं यदा एक फ़कीर की, चिंताएं रहती उसे सिर्फ दो वक्त रोटी की, घटती वर्षो की उम्र , लटके झुर्रियां अब सब कुछ बयां करती हैं, सफेद होते बाल अब हमे "डायन" कहा करती हैं, डरते है लोग जो चेहरा भूत की, 

||| टिमटिमाती तारे बिजली का था |||

बढ़ती, टिमटिमाती तारो की तरह पर गिन सकते थे  कही गाढ़े, कहीं एका–दुका बिखरे जैसे थे बस एक ही फासला इनमे था टिमटिमाती तारे बिजली का था एक जो गगन का बिंदि था वहीं दूसरा इस धरती का बत्ती(खोजा हुवा) था एक जो कहीं से भी दिखाई पड़ता था वहीं दूसरा हर कदम पर धुंधला पड़ता था ठीक  हू –ब –हू  हमारी यादें की तरह पीछा करता तारो की तरह पर ये साया गायब हो रहा होता बिल्कुल तारो की तरह अब थी एक नई सुबह, नई दिशा जो लेकर जाती पवन की तरह।।।

अरे! रह गए... थोड़ा पीछे

अरे!  रह गए... थोड़ा पीछे  बढ़ने का मौका तो दो क्या पता शायद आपके करीब अ जाए एक बार ही सही हाथ बढ़ा कर तो देखो क्या पता दोस्त बन जाए एक बार ही सही अपने अन्दर की तो सुनो क्या पता दिल की भी यही राय हो

||| कब तक, कहां तक भागो गे |||

कब तक, कहां तक भागो गे |2| कब तक, और क्या–क्या छोड़े गे निकल जायेगी ज़िंदगी फिर पछताओगे एक बात बताऊं मैं–"अगर भागने की वजह ढूढोगे तो शायद कुछ मिले या न मिले पर खुद को पहचान पाओगे, खुद से लड़ पाओगे  हू–ब–हू पतझड़ ऋतु की तरह एक नई ज़िंदगी से जी पाओगे" कब तक, कहां तक भागो गे  कब तक, और क्या–क्या छोड़े गे एक और बात बताऊं –"अगर योजना के साथ बढ़ेगो तो शायद ख़ुद पर विश्वास कर पाओगे कब तक, और क्या–क्या छोड़े गे कब तक, कहां तक भागो गे ।।।