Posts

लाइफ साइकिल|| LIFE CYCLE ||

  मैं अक्सर अकेला होता हूं जब रोता हूं तब कुछ अच्छा और बुरा का एहसास करता हूं किसी से दूर, कमियां और न जाने क्या क्या महसूस करता हूं और अंत में जब आंखो से आंसू निकल गिर जाते है तब कुछ हल्का सा लगता है कोशिश करता हूं खुश रहने का, पर ऐसा लगता हैमानो पिछे से कोई जकड़ता है और कुछ बुदबुदाने सा केहता है  तो अचानक मै सोचता हूं  न जाने किस लिए मैं रोता हूं  और फिर जो मेरे पास है अभी उसकी परवाह करता हूं । कुछ नया और अलग सोचता हूं  और फ़िर क्या निकल पड़ता हूं अपने वादे को पूरा करने फिर समय की इस रफतार में जहां से शुरूवात करता हूं शायद वापिस वहीं आ जाता हूं और फ़िर मैं अक्सर रोता हूं जब मैं अकेला होता हूं फिर से सोचता हूं और निकल पड़ता हूं यही कोई पहिए जैसा गोल गोल घुमाता रहता हूं

जाने वाले से कैसे पूछे

जाने वाले से कैसे पूछे क्या बताना चाहता था किसकी फिक्र थी किससे मिलना का दिल था उल्टे पहिये में भी उम्मीदे बहुत थी जाने वाले से कैसे पूछे  क्या खाने का मन था किसे एक झलक देख लेने का दिल चाहता था उल्टे पहिये में भी उम्मीदे बहुत थी पर वक्त उससे भी तेज़ दौड़ रहा था जो टली न अबतक उसी का इंतजार था रब की इस रुहाई में किसे पता कब तक मुक्त की सांस मिलनी थी दौड़ता वक्त अब उनसे जीत चुका था

वो पुराने दिन वो सुहाने दिन

 वो पुराने दिन  वो सुहाने दिन आशिक़ाने दिन  ओस की नमी में भीगे  वो पुराने दिन दिन गुज़र गए  हम किधर गए  पीछे मुड़ के देखा पाया सब ठहर गए  अकेले हैं खड़े क़दम नहीं बढ़े  चल पड़ेंगे जब भी कोई  राह चल पड़े  जाएँगे कहाँ  है कुछ पता नहीं  कह रहे हैं वो कि उनकी है ख़ता नहीं  वो सुहाने दिन  आशिक़ाने दिन  ओस की नमी में भीगे  वो पुराने दिन… ~ पीयूष मिश्रा

|||| वर्णमाला |||

एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँ अ  से अनार अ से अमरूद लेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचार कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से क्रूरता क से कुटिलता अभी तक ख से खरगोश लिखता आया हूँ लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है मैं सोचता था फ से फूल ही लिखा जाता होगा बहुत सारे फूल घरो के बाहर घरों के भीतर मनुष्यों के भीतर लेकिन मैंने देखा तमाम फूल जा रहे थे ज़ालिमों के गले में माला बन कर डाले जाने के लिए कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है द दमन का और प पतन का सँकेत है आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं समाज की हिंसा ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें वे ह से हत्या लिखते रहते हैं हर समय |                             ——   श्रीमंगलेश डबराल

||| देख लू एक बार दुनिया को |||

उड़ लू हवा के झोको में चुंग लू दाना पानी इन्हीं खेतों में पी लू नदियों की पानी इन्ही हवा के झोको में                              देख लू एक बार... दुनिया को                              फिर चाहे रखना किसी कमरे मे                              छोड़ी संसार, छोड़ी उम्मीदें                              बस सिर्फ रखना हमे पिंजड़े में पंख काटे तूने... दाना भी देना तू न उड़ पाऊंगा हवा के झोको में चुंग न पाऊंगा खेतों में पंख काटे तूने... रखना पिंजड़े में                        न नदिया, पानी, और न खेतों की                         हरियाली,             ...

||| डायन |||

 थस सा जा रहा, उभरे हड्डियां अब सब कुछ बयां करती हैं, हाथ फैला लेने को मजबूर करती है, तन पर लपेटे पतली सी गंदी लिबास , नंगे पांव पैर के ऊपर कई घाव के दाग , करती हैं यदा एक फ़कीर की, चिंताएं रहती उसे सिर्फ दो वक्त रोटी की, घटती वर्षो की उम्र , लटके झुर्रियां अब सब कुछ बयां करती हैं, सफेद होते बाल अब हमे "डायन" कहा करती हैं, डरते है लोग जो चेहरा भूत की, 

||| टिमटिमाती तारे बिजली का था |||

बढ़ती, टिमटिमाती तारो की तरह पर गिन सकते थे  कही गाढ़े, कहीं एका–दुका बिखरे जैसे थे बस एक ही फासला इनमे था टिमटिमाती तारे बिजली का था एक जो गगन का बिंदि था वहीं दूसरा इस धरती का बत्ती(खोजा हुवा) था एक जो कहीं से भी दिखाई पड़ता था वहीं दूसरा हर कदम पर धुंधला पड़ता था ठीक  हू –ब –हू  हमारी यादें की तरह पीछा करता तारो की तरह पर ये साया गायब हो रहा होता बिल्कुल तारो की तरह अब थी एक नई सुबह, नई दिशा जो लेकर जाती पवन की तरह।।।